शनि शत्रु नहीं परम कल्याणकारी है
सामान्य से प्रचलित नियम के अनुसार लग्न, सूर्य और चन्द्र तथा चलित नाम राशियों से विभिन्न राशियों पर शनि ग्रह की गोचरवश
स्थिति शनि की साढ़े साती अथवा शनि की ढइया कहलाती हैं। सामान्यतः यह भय और भ्रम भी
जनमानस में व्याप्त है कि शनि ग्रह की गोचर वश यह स्थितियाँ व्यक्ति के लिए सदैव कष्टकारी
होती हैं। उनके कार्य या तो सिद्ध नहीं होते और होते भी हैं तो वह बहुत विलम्ब से अथवा
कठिनाइयों से। उनके जीवन का इस काल में सारा विकास अवरुद्ध हो जाता है। यह अवधि व्यक्ति
दुःख, रोग, शोक, दारिद्रय,
मानसिक संत्रास, अपमान आदि में व्यतीत करता है।
एक व्यक्ति की औसत आयु यदि 90 वर्ष मानें तो इस प्रकार शनि के
निश्चित परिपथ पर भ्रमण काल के मध्य वह अपने जीवन के 22 12 वर्ष
साढे साती और 15 वर्ष शनि की ढइया काल में व्यतीत करेगा। इस गणित
से उसके जीवन के 3712 वर्ष तो शनि ग्रह के इस तथाकथित दोष में
ही व्यतीत हो गये। फिर उसके जीवन में शेष क्या बचा रह गया! किसी को शनि ग्रह से सम्बन्धित
इस दोष का यदि गम्भीरता से भययुक्त दोष स्पष्ट करवा दिया जाए तब उसकी मनः स्थिति का
आप स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं। शनि के दोष से न भी मरता होगा, उसके मय से तो वह निश्चित ही मर जाएगा। जैसा कि साँप के विषय में सर्वविदित
है - ‘काटने से नहीं मरा उसके भय से मर गया।’ जातक ग्रथों में शनि के इस तथाकथित दोष और उनसे उत्पन्न शुभाशुभ की जो स्थितियाँ
बनती हैं यदि उन सबको जोड़ लिया जाए तो मूलतः वह चार प्रकार की हो सकती हैं। शुभाशुभ
का यह प्रभाव जन्मप़त्री में स्थित ग्रहों की बलाबल स्थितियों पर अधिक निर्भर करता
है। जन्मपत्री में जन्मराशि (अथवा अन्य वह राशियाँ जिनसे शनि के गोचर का शुभाशुभ विचार
किया जा रहा है) शुभ हो अर्थात षडवर्ग में बलवान हो और चलित नाम राशि अशुभ हों। दूसरे,
जन्म राशि और चलित नाम राशियाँ दोनों ही शुभ हों। तीसरे, जन्म राशि अशुभ हो और चलित नाम राशि शुभ हो और चौथे, जन्म राशि और चलित नाम राशियाँ दोनों ही अशुभ हों।
शनिग्रह के गोचर का शुमाशुभ प्रभाव
वस्तुतः इन चार बातों के अध्ययन पर अधिक निर्भर करेगा। अधिकांशतः देखने में यही आता
है कि शनि के गोचर प्रभाव को कहने से पहले यह अथवा इन जैसी अनेक अन्य ग्रहों की बलाबल
स्थितियों को तो छोड़ दिया जाता है और शनि की ठइया अथवा साढे साती की एक स्थिति विशेष
को बस शनि का भूत बना दिया जाता है।
कुल़ परिणाम
यह स्पष्ट होता है कि शनि का गोचर प्रायः कष्टकारी नहीं होता। अनकों ऐसें उदाहरण प्रस्तुत
किए जा सकते हैं कि शनि की इन विपरीत गोचर स्थितियों में व्यक्ति ने सफलता की अनेकों
सीढ़ियाँ पार की हैं। इन विपरीत शनि के काल में भी व्यक्तियों को सुख, ऐश्वर्य, मान, सम्मान आदि सब कुछ
उपलब्ध हुए हैं।
शनि, देखा जाए तो भौतिकवाद का प्रतीक है। अर्थ, काम,
मोह आदि के कारण व्यक्ति के कर्म एक जन्म के न होकर जन्म-जन्मान्तर,
युग-युगान्तर से संचित होते रहते हैं। इन संचित कर्मों के अनुसार ही
शनि ग्रह उन शुमाशुभ कर्मों के अनुरूप वर्तमान में भोग करवाता है। अपने दैनिक जीवन
में हम सब देख और सुन ही रहे हैं कि कोई व्यक्ति राजा से रंक और रंक से राजा कैसे बन
जाता है। जातक ग्रथों में शनि ग्रह को इन स्थितियों में पहुँचाने का उत्तरदायी माना
गया है। कार्मों के अनुरूप फल देने के कारण ही इसको न्यायाधीश भी कहा गया है। यह शुमाशुभ
फल कब देगा, इस सबकी गणना जन्मपत्री में शनि की दशा, अन्तर्दशा और विभिन्न राशियों में गोचरवश स्थितियों के आधार पर गणनाएं की जा
सकती हैं।
विधि का
यह नियम है कि यदि कोई समस्या है तो उसका निदान भी कहीं न कहीं अथवा किसी न किसी रूप
में अवश्य उपलब्ध है। आवश्यकता है केवल पहले समस्या के उचित कारण जानने की और तदनुसार
उसके निराकरण के उपाय तलाशने की। यदि वास्तव में शनि ग्रह के भूत भय से अलग शनि ग्रह
जनित दोष के कारण कोई पीडा़ झेल रहे हैं तो वह यह उपाय अपनी सुविधानुसार एक बार अवश्य
कर लें।
कौन सा
उपाय आप चयन करें यह आपके अपने-अपने बुद्धि और विवेक पर अधिक निर्भर करेगा। परन्तु
जो कोई भी उपाय आप करें उसके प्रति यह श्रृद्धा और आस्था अवश्य बलवती रखें कि आपकी
जटिल समस्या का उचित समाधान मिल गया है और उससे आपके कष्ट अवश्य की दूर होंगे।
1. हनुमान जी का ‘ॐ हं पवन नन्दनाय नमः’ मंत्र जप किया करें।
2. हनुमान जी की पूजा क्रम में हनुमान
चालीसा, हनुमान अष्टक, सुन्दर काण्ड,
हनुमान कवच, हनुमान बाहुक, बजरंग बाण, हनुमान स्तोत्र आदि का पठन-पाठन सर्वविदित
है। आप शनि ग्रह दोष निवारण हेतु जो भी कर रहे हैं, सब अच्छा
है। परन्तु इन सबमें बजरंगबाण सर्वाधिक प्रभावशाली सिद्ध हुआ है, ऐसा अनेक बार लोगों का स्वयं का अनुभव सामने आया है।
3. मत्स्य पुराण के अनुसार पीड़ाकारक
ग्रह की शान्ति और पुष्टि दोनों के लिए, लक्ष्मी कृपा और दीर्घायुष्य
के लिए ग्रह यज्ञ का विधान है। किसी योग्य व्यक्ति द्वारा इसका विधान समझकर यह स्वयं
भी किया जा सकता है।
यदि शनि
दोष की पीड़ा है तो यह भ्रम मन से बिल्कुल निकाल दें कि मात्र शनिवार के दिन कुछ क्रम-उपक्रम
कर लेने से समस्या का समाधान हो जाएगा। बौद्धिकता से स्वयं मनन करें कि क्या शनि ग्रह
घात में बैठा रहता है कि कब शनिवार आए और वह अपना उत्पात प्रारम्भ कर दे। शनि ग्रह पीड़ा से ग्रसित हैं तब तो वह आठों
पहर और चौबीसों घड़ी पीड़ा देगा ही देगा।
4. एक लोहे का पात्र लेकर उसमें शनि
स्वरूप आकृति स्थापित कर लें। नित्य प्रातः काल उठकर थोड़े से तेल में अपनी छाया पर
त्राटक करें और भाव बलवती करें कि आपके शनि ग्रह जनित समस्त दोषों का पलायन हो रहा
है। यह भावना करते हुए पात्र में तेल छोड़ दें। यह नियम यथा सम्भव नित्य प्रति के अपने
अन्य दैनिक कर्मों के साथ जोड़ लें। जब पात्र भरने लगे तो किसी शनिदान वाले को दिन के
समय दान कर दें।
5.मंत्र जाप शनि ग्रह पीडा़ निवारण के लिए एक अच्छा और
सशक्त उपाय सिद्ध होता है।
शनि गायत्री
-
ॐ कृष्णांगाय
विद्महे रविपुत्राय धीमहि तनः सौरिः प्रचोदयात्।
वेद मंत्र -
ॐ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तु
नः।
बीज मंत्र -
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
अन्त में यह बात सदैव ध्यान रखें कि शनि अतुलित
भौतिक सुख वैभव आदि देता है परन्तु यही सुखों की कामना सतत् लालसा जब हवस बन जाती हैं
तब उन संचित दुष्कर्मों का दण्ड देने के लिए शनि एक क्रूर न्यायाधीश बन जाता है और
विधिगत उचित न्याय करता है।
शनि राखै
संसार में हर प्राणी की खैर।
न काहु
से दोस्ती, न काहू से बैर।।
शनि ग्रह
को यदि वास्तव में हमने जान लिया तो शनि शत्रु नहीं अपितु मित्र और विनाश अथवा कष्टकारी
नहीं बल्कि परम कल्याणकारी सिद्ध होने लगेगा।

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