Saturday, January 24, 2015
Sunday, October 12, 2014
नाम के अंकों से करें रोग का निदान
गोपाल राजू की
सर्वाधिक चर्चित पुस्तक,
‘बच्चों के भाग्यशाली नाम’
का सार-संक्षेप
यदि समस्या
है तो उसका कोई न कोई समाधान भी कहीं न कहीं अवश्य छिपा हुआ है। आवश्यकता है उस समाधान
विशेष की तलाश करने की तदनुसार विशुद्ध गणनाओं के द्वारा समस्या विशेष के निदान की।
परन्तु यह उतनी सरल नहीं है जितनी कि व्यवसायी वर्ग द्वारा सर्वसाधारण को अज्ञानता
और बहुतायत में परोसी जा रही है। देखा जाए तो उचित समाधान के पीछे छिपा है ज्योतिष, अंक, सामुद्रिक आदि अनेको गुह्य विधाओं का विस्तृत ज्ञान,
धैर्यपूर्वक तथा निःस्वार्थ श्रम साध्य और बौद्धिक गणनाएं।
अंक शास्त्र में नौ तक के अंकों में अनेक बीमारियां देने का नैसर्गिक दोष समाहित
है, तदनुसार व्यक्ति शारीरिक कष्ट भी भोग सकता है।
किसी माह की 1, 10, 19 तथा 28वीं
तारीख में जन्में व्यक्ति हदयरोग अथवा उच्च रक्त चाप आदि बीमारियों से पीड़ित हो सकते
हैं।
माह की
2,
11 तथा 29वीं तिथियों में जन्म लेने से पेट संबंधी अनेक रोग संभावित
होते हैं।
3, 12, 21 तथा 30वीं तारीख में जन्में व्यक्ति स्नायु तंत्र से
संबंधित रोगी हो सकते हैं।
माह की
4,
13, 22 तथा 21वीं तिथि में जन्में व्यक्ति मानसिक
रोग तथा रक्त की कमी के शिकार हो सकते हैं।
किसी माह की 5, 14 तथा 23वीं तिथि में जन्मे व्यक्ति स्नायु तंत्र अथवा पक्षाघात से पीड़ित हो सकते हैं।
माह की
6,
15 तथा 24वीं तारीख जन्म लेने वाले नाक, गला अथवा
फेफड़े संबंधी रोगी हो सकते हैं।
7, 16 तथा 25वीं तारीख में जन्म लेने से त्वचा के अनेक रोग
संभावित रहते हैं।
माह की
8,
17 तथा 26वीं तारीख में जन्म लेने से व्यक्ति लीवर, आंत अथवा अन्य पेट का रोगी हो सकता है।
माह की
9,
18 तथा 27वीं तारीख में जन्म लेने वाला खसरे अथवा अन्य त्वचा के रोगों
से पीड़ित हो सकता है।
आप देखें
कि उक्त तिथियों में आपका जन्म कहॉ हुआ है। यह आवश्यक नहीं कि आप रोगी हों ही, क्योंकि रोगी होना अथवा न होना अन्य बातों की तरह ज्योतिष के अन्य घटकों पर
भी निर्भर करता है।
दुर्भाग्य
से यदि आप रोगी हैं तो एक संभावना यह भी हो सकती है कि आपका नाम आपके जन्मांकों के
अनुरुप नहीं है, तदनुसार वह आपको रोगी बना रहा है। सामान्यतः शुभ के लिए
नाम परिवर्तन के समय रोग, स्थान आदि जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर
हमारा ध्यान ही नहीं जाता है। बच्चों अथवा अपने नाम चयन से पूर्व सदैव प्रयास करें
कि यह पहलू भी आपके गणनाओं में पहले से ही आ जाए।
उदाहरण
के लिए माना आप 4 नवंबर को पैदा हुए हैं और मानसिक संत्रास से पीड़ित हैं,
तो आपके लिए यही उत्तम रहेगा कि पहले वह नाम तलाशें जो मानसिक संत्रास
से आपको मुक्ति दिला सके। 4 के मित्र हैं - 4, 5, 6,
7 तथा 8 अंक। इस अंक के प्रतिनिधि ग्रह हैं राहु
और सूर्य। सर्वप्रथम प्रयास करें कि इन पांच मित्र अंकों में से ही कोई एक वह अंक आपका
नामांक बने जिससे संबंधित ग्रह भी जन्म कुण्डली में बलवान हो और बीमारी देने वाले अंक
तथा संबंधित ग्रह से परस्पर छठे, आठवें अथवा दूसरे, बारहवें भाव में स्थित न हो । आपका यह चुनाव सर्वोत्तम सिद्ध होगा। दूसरे,
तीसरे अथवा अन्य क्रम में वह अंक तथा ग्रह चुनें जो अंक 4 के मित्र हों।
15 फरवरी 1975 में जन्मी एक लड़की के उदाहरण से नाम चयन
करना अधिक सरल हो जाएगा। इस लड़की का नाम चयन करते समय ज्योतिष का भी मैंने पूरी तरीके
से सहारा लिया गया था।
लड़की के प्रचलित नाम VARIJA के नामांक से प्रारंभ करते हैं।
V 6 V 6
A 1 A 1
R 2 R 2
I 1 S 3
J 1 H 5
A 1 A 1
------- -------
3 9
नामांक = 12 = 1+2 = 3
बदला नामांक, VARSHA = 18
= 1+8 = 9
- वारिजा के मूलांक
और भाग्यांक 6 और 3 परस्पर शत्रु हैं।
- 6 अंकशास्त्र
में सांस की नली में दोष दर्शाता है तदनुसार नाक, गला,
फेफड़े आदि के रोग देता है।
- जन्म पत्रिका
ध्यान से देखें तो स्पष्ट होता है कि मूलांक तथा नामांक के अंक क्रमशः 6 और 3 पंचधादि
मैत्री में भी शुभ नहीं हैं।
- पत्री में तृतीय
भावगत शनि, तृतीय भाव का स्वामी ग्रह बुध अपने से अष्टम में होने
के कारण इस भाव को दोषपूर्ण बना रहा है। बुध केतु की दृष्टि से पीड़ित है। तृतीय भाव
पर मंगल तथा राहु पाप ग्रहों से दृष्ट है।
- ज्योतिष में बुध
स्नायु तंत्र पर नियंत्रण रखता है। वारिजा की पत्री में श्वसन तथा स्नायु तंत्र के
रोग को छोड़कर अन्य कहीं कोई कमी नहीं है। उन्हें जीवन के सब सुख और ऐश्वर्य भोगने को
मिले हैं। दुर्भाग्य से किसी का भी ध्यान निदान के समय उनके नाम पर नहीं गया। खोजी
प्रवृत्ति के कारण अन्य निदान के पहलुओं के साथ-साथ नाम पर मैंने विशेष ध्यान दिया।
- वारिजा के लिए
5, 8, 9 अंक सम हैं।
- इनमें मंगल का
अंक 9 मुझे विशेष प्रभावशाली लगा। ज्योतिषीय आंकलन से भी पत्री में मंगल बलवान है।
- मंगल लग्न का
स्वामी है तथा नवम भाव में अपनी मित्र राशि में स्थित है।
- मंगल मूलांक तथा
भाग्यांक के प्रतिनिधि ग्रहों का मित्र है।
- नवमांश में मंगल
अपनी स्वयं की राशि वृश्चिक में स्थित है।
- मंगल शुक्र ग्रह
के नक्षत्र में है, जो कि इसकी शुभ राशि है। इसलिए भी मंगल अधिक
बलवान हो गया है।
पाठक जानकर और भी प्रेरित होंगे कि वारिजा के नए नाम वर्षा परिवर्तन से
उन्हें बहुत राहत मिली। कहते हैं, कि भाग्य अच्छा हो तो निदान भी उपयुक्त
मिल जाते हैं। ठीक ऐसा ही वारिजा के साथ हुआ। आज वह सुखी एवं स्वस्थ जीवन बिता रही
हैं ।
गोपाल राजू (वैज्ञानिक)
Sunday, September 28, 2014
शनि शत्रु नहीं परम कल्याणकारी है
शनि शत्रु नहीं परम कल्याणकारी है
सामान्य से प्रचलित नियम के अनुसार लग्न, सूर्य और चन्द्र तथा चलित नाम राशियों से विभिन्न राशियों पर शनि ग्रह की गोचरवश
स्थिति शनि की साढ़े साती अथवा शनि की ढइया कहलाती हैं। सामान्यतः यह भय और भ्रम भी
जनमानस में व्याप्त है कि शनि ग्रह की गोचर वश यह स्थितियाँ व्यक्ति के लिए सदैव कष्टकारी
होती हैं। उनके कार्य या तो सिद्ध नहीं होते और होते भी हैं तो वह बहुत विलम्ब से अथवा
कठिनाइयों से। उनके जीवन का इस काल में सारा विकास अवरुद्ध हो जाता है। यह अवधि व्यक्ति
दुःख, रोग, शोक, दारिद्रय,
मानसिक संत्रास, अपमान आदि में व्यतीत करता है।
एक व्यक्ति की औसत आयु यदि 90 वर्ष मानें तो इस प्रकार शनि के
निश्चित परिपथ पर भ्रमण काल के मध्य वह अपने जीवन के 22 12 वर्ष
साढे साती और 15 वर्ष शनि की ढइया काल में व्यतीत करेगा। इस गणित
से उसके जीवन के 3712 वर्ष तो शनि ग्रह के इस तथाकथित दोष में
ही व्यतीत हो गये। फिर उसके जीवन में शेष क्या बचा रह गया! किसी को शनि ग्रह से सम्बन्धित
इस दोष का यदि गम्भीरता से भययुक्त दोष स्पष्ट करवा दिया जाए तब उसकी मनः स्थिति का
आप स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं। शनि के दोष से न भी मरता होगा, उसके मय से तो वह निश्चित ही मर जाएगा। जैसा कि साँप के विषय में सर्वविदित
है - ‘काटने से नहीं मरा उसके भय से मर गया।’ जातक ग्रथों में शनि के इस तथाकथित दोष और उनसे उत्पन्न शुभाशुभ की जो स्थितियाँ
बनती हैं यदि उन सबको जोड़ लिया जाए तो मूलतः वह चार प्रकार की हो सकती हैं। शुभाशुभ
का यह प्रभाव जन्मप़त्री में स्थित ग्रहों की बलाबल स्थितियों पर अधिक निर्भर करता
है। जन्मपत्री में जन्मराशि (अथवा अन्य वह राशियाँ जिनसे शनि के गोचर का शुभाशुभ विचार
किया जा रहा है) शुभ हो अर्थात षडवर्ग में बलवान हो और चलित नाम राशि अशुभ हों। दूसरे,
जन्म राशि और चलित नाम राशियाँ दोनों ही शुभ हों। तीसरे, जन्म राशि अशुभ हो और चलित नाम राशि शुभ हो और चौथे, जन्म राशि और चलित नाम राशियाँ दोनों ही अशुभ हों।
शनिग्रह के गोचर का शुमाशुभ प्रभाव
वस्तुतः इन चार बातों के अध्ययन पर अधिक निर्भर करेगा। अधिकांशतः देखने में यही आता
है कि शनि के गोचर प्रभाव को कहने से पहले यह अथवा इन जैसी अनेक अन्य ग्रहों की बलाबल
स्थितियों को तो छोड़ दिया जाता है और शनि की ठइया अथवा साढे साती की एक स्थिति विशेष
को बस शनि का भूत बना दिया जाता है।
कुल़ परिणाम
यह स्पष्ट होता है कि शनि का गोचर प्रायः कष्टकारी नहीं होता। अनकों ऐसें उदाहरण प्रस्तुत
किए जा सकते हैं कि शनि की इन विपरीत गोचर स्थितियों में व्यक्ति ने सफलता की अनेकों
सीढ़ियाँ पार की हैं। इन विपरीत शनि के काल में भी व्यक्तियों को सुख, ऐश्वर्य, मान, सम्मान आदि सब कुछ
उपलब्ध हुए हैं।
शनि, देखा जाए तो भौतिकवाद का प्रतीक है। अर्थ, काम,
मोह आदि के कारण व्यक्ति के कर्म एक जन्म के न होकर जन्म-जन्मान्तर,
युग-युगान्तर से संचित होते रहते हैं। इन संचित कर्मों के अनुसार ही
शनि ग्रह उन शुमाशुभ कर्मों के अनुरूप वर्तमान में भोग करवाता है। अपने दैनिक जीवन
में हम सब देख और सुन ही रहे हैं कि कोई व्यक्ति राजा से रंक और रंक से राजा कैसे बन
जाता है। जातक ग्रथों में शनि ग्रह को इन स्थितियों में पहुँचाने का उत्तरदायी माना
गया है। कार्मों के अनुरूप फल देने के कारण ही इसको न्यायाधीश भी कहा गया है। यह शुमाशुभ
फल कब देगा, इस सबकी गणना जन्मपत्री में शनि की दशा, अन्तर्दशा और विभिन्न राशियों में गोचरवश स्थितियों के आधार पर गणनाएं की जा
सकती हैं।
विधि का
यह नियम है कि यदि कोई समस्या है तो उसका निदान भी कहीं न कहीं अथवा किसी न किसी रूप
में अवश्य उपलब्ध है। आवश्यकता है केवल पहले समस्या के उचित कारण जानने की और तदनुसार
उसके निराकरण के उपाय तलाशने की। यदि वास्तव में शनि ग्रह के भूत भय से अलग शनि ग्रह
जनित दोष के कारण कोई पीडा़ झेल रहे हैं तो वह यह उपाय अपनी सुविधानुसार एक बार अवश्य
कर लें।
कौन सा
उपाय आप चयन करें यह आपके अपने-अपने बुद्धि और विवेक पर अधिक निर्भर करेगा। परन्तु
जो कोई भी उपाय आप करें उसके प्रति यह श्रृद्धा और आस्था अवश्य बलवती रखें कि आपकी
जटिल समस्या का उचित समाधान मिल गया है और उससे आपके कष्ट अवश्य की दूर होंगे।
1. हनुमान जी का ‘ॐ हं पवन नन्दनाय नमः’ मंत्र जप किया करें।
2. हनुमान जी की पूजा क्रम में हनुमान
चालीसा, हनुमान अष्टक, सुन्दर काण्ड,
हनुमान कवच, हनुमान बाहुक, बजरंग बाण, हनुमान स्तोत्र आदि का पठन-पाठन सर्वविदित
है। आप शनि ग्रह दोष निवारण हेतु जो भी कर रहे हैं, सब अच्छा
है। परन्तु इन सबमें बजरंगबाण सर्वाधिक प्रभावशाली सिद्ध हुआ है, ऐसा अनेक बार लोगों का स्वयं का अनुभव सामने आया है।
3. मत्स्य पुराण के अनुसार पीड़ाकारक
ग्रह की शान्ति और पुष्टि दोनों के लिए, लक्ष्मी कृपा और दीर्घायुष्य
के लिए ग्रह यज्ञ का विधान है। किसी योग्य व्यक्ति द्वारा इसका विधान समझकर यह स्वयं
भी किया जा सकता है।
यदि शनि
दोष की पीड़ा है तो यह भ्रम मन से बिल्कुल निकाल दें कि मात्र शनिवार के दिन कुछ क्रम-उपक्रम
कर लेने से समस्या का समाधान हो जाएगा। बौद्धिकता से स्वयं मनन करें कि क्या शनि ग्रह
घात में बैठा रहता है कि कब शनिवार आए और वह अपना उत्पात प्रारम्भ कर दे। शनि ग्रह पीड़ा से ग्रसित हैं तब तो वह आठों
पहर और चौबीसों घड़ी पीड़ा देगा ही देगा।
4. एक लोहे का पात्र लेकर उसमें शनि
स्वरूप आकृति स्थापित कर लें। नित्य प्रातः काल उठकर थोड़े से तेल में अपनी छाया पर
त्राटक करें और भाव बलवती करें कि आपके शनि ग्रह जनित समस्त दोषों का पलायन हो रहा
है। यह भावना करते हुए पात्र में तेल छोड़ दें। यह नियम यथा सम्भव नित्य प्रति के अपने
अन्य दैनिक कर्मों के साथ जोड़ लें। जब पात्र भरने लगे तो किसी शनिदान वाले को दिन के
समय दान कर दें।
5.मंत्र जाप शनि ग्रह पीडा़ निवारण के लिए एक अच्छा और
सशक्त उपाय सिद्ध होता है।
शनि गायत्री
-
ॐ कृष्णांगाय
विद्महे रविपुत्राय धीमहि तनः सौरिः प्रचोदयात्।
वेद मंत्र -
ॐ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तु
नः।
बीज मंत्र -
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
अन्त में यह बात सदैव ध्यान रखें कि शनि अतुलित
भौतिक सुख वैभव आदि देता है परन्तु यही सुखों की कामना सतत् लालसा जब हवस बन जाती हैं
तब उन संचित दुष्कर्मों का दण्ड देने के लिए शनि एक क्रूर न्यायाधीश बन जाता है और
विधिगत उचित न्याय करता है।
शनि राखै
संसार में हर प्राणी की खैर।
न काहु
से दोस्ती, न काहू से बैर।।
शनि ग्रह
को यदि वास्तव में हमने जान लिया तो शनि शत्रु नहीं अपितु मित्र और विनाश अथवा कष्टकारी
नहीं बल्कि परम कल्याणकारी सिद्ध होने लगेगा।
Saturday, September 27, 2014
अंक 2, 7 तथा 9 ने बिठाया है सर्वाधिक आतंकी धमाकों का गणित
vkradh geyksa ds ihNs fNis gSa dqN [kwuh vad
|| अंक 2, 7 तथा 9 ने बिठाया है सर्वाधिक आतंकी धमाकों का गणित ||
जब भी कोई आतंकी धमाका होता है, देश-विदेश दहल जाते हैं। फिर धीरे-धीरे समय सब घाव भर देता है और सब कुछ पुनः समान्य गति से होने लगता है। कौन फैलाता है यह दहशतगर्दी? किसकी विनाशक बुद्धि अंजाम देती है इन आतंकवादी धमाकों को? क्या हैं शांतिपूर्ण वातावरण बनाने के निदान? अपने-अपने बुद्धि विवेक से प्रत्येक व्यक्ति, समाज और देश गंभीरता से ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर तलाशते हैं। थोड़ा सा गंभीर चिंतन दिखाई देता है और कुछ समय बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। अधिकांशतः देखा जाता है कि इन सब बातों का अंततः एक ही समाधान निकलता है - कड़ी सुरक्षा व्यवस्था का समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार विस्तार। परंतु देर-सबेर परिणाम फिर भी वही निकलता है - एक और आतंवादी धमाका।
सोमवार, 15 अप्रेल 2013 को अमेरिका के बोस्टन शहर में हुए सिलसिले वार दो धमाकों ने पूरे विश्व को हिला कर रख दिया। 12 वर्ष पहले 11 सितंबर 2001 को हुए इन धमाकों में जान-माल की हुई हानि से अधिक महत्वपूर्ण और उतनी ही चिंताजनक बात यह रही कि दहलाने वाले यह धमाके एक महाशक्तिशाली देश में हुए। देखा जाए तो आतंकवाद की यह एक बहुत बड़ी चुनौती है। जो तमाम सुरक्षा व्यवस्था को अंगूठा दिखा रही है। बात अभी शांत भी नहीं हुई थी 17 अप्रेल 2013 को बैंगलोर शहर में हुए धमाकों ने एक और तमाचा जड़ दिया सुरक्षा व्यवस्था पर।
सर्वाधिक विध्वंसक आंकड़ा 2, 7 तथा 9 अंकों ने बैठाया है सैकड़ों आतंकी हमलों और धमाकों का गणित। क्र सैकड़ों आतंकी हमलों का श्रमसाध्य आंकलन करके लेखक ने सिद्ध कर दिया है कि भाग्यशाली 1 सर्वाधिक सुरक्षित अंक रहा है।
|
जिज्ञासु वर्ग में एक विचार यह अवश्य आता होगा कि आतंकवादी इन धमाकों का कोई पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है ताकि उस घड़ी में सुरक्षा व्यवस्था के और भी पुख्ता इंतजाम किए जा सकें।
अंक-ज्योतिष शास्त्र की मानें तो इस समस्या का समाधान कुछ हद तक संभव भी हो सकता है। अपनी दीर्घ कालीन खोज में मैंने पाया है कि कुछ अंकों के पीछे आतंकवाद छिपा है। भारत के मुम्बई, जम्मू, हैदराबाद, दिल्ली आदि छोटे-बड़े शहरों के हमले हों अथवा रुस, अल्जीरिया, काबुल, ईरान, पाकिस्तान आदि में घटित छोटी-बड़ी कोई अन्य आतंकवादी गतिविधि, कहीं न कहीं अंकों का गणित सामने अवश्य आया है। ज्योतिषीय ग्रह-गोचर के द्वारा गंभीरता से यदि अंकों की भाषा को पढ़ने-समझने का प्रयास किया जाए तो इस प्रकार की घटनाओं का पूर्वानुमान लगाना भी संभव है। अंकों में शुभाशुभ का फल देने का विलक्षण गुणधर्म छिपा है। यह तथ्य आज विश्वस्तर पर स्वीकारा जा रहा है। हजारों की संख्या में अंकों के अनुकूल नाम गणना करके मैंने भी व्यक्ति के व्यवहार, एकाग्रता, पढ़ाई, व्यापार, स्वास्थ्य आदि में चमत्कारिक रुप से परिवर्तन होते देखे हैं। विषय के विस्तृत ज्ञान और अंकशास्त्र की सार्थकता के लिए मेरी सर्वाधिक चर्चित पुस्तक, ‘स्वयं चुनिए अपना भाग्शाली नाम’ देखी जा सकती है। यह उक्त तथ्यों का सटीक प्रमाण सिद्ध होगी।
अब से लगभग एक दशक पूर्व 200 से अधिक विश्वभर के छोटे-बड़े आतंकी धमाकों और हमलों का मैंने अंक-ज्योतिषीय श्रमसाध्य आंकलन करके चमत्कारी पहलू उजागर किए थे। ज्योतिष की दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में उनका प्रकाशन भी हुआ था। अपने शोध कार्य में मैंने पाया था कि ऐसी आतंकवादी घटनाओं में अंक 1 की आवृत्ति सबसे कम हुई थी, भले ही अंक 1 घटना के समय मूलांक रहा हो अथवा भाग्यांक।
ज्योतिष में प्रत्येक अंक किसी न किसी ग्रह को इंगित करता है। 78 प्रतिशत से अधिक उदाहरणों में आतंक के कारक मूलांक अथवा जन्मांक 2, 7 और 9 पाए गए। उनके प्रतीक कारक ग्रह किसी न किसी रुप से अग्नि तत्व राशियों से जुड़े हुए थे। ज्योतिष में सूर्य, मंगल, शनि, प्लूटो और नेप्च्यून ग्रहों को युद्ध जैसी घटनाओं को अंजाम देने का जिम्मेदार माना गया है। देखा गया कि इन क्रूर ग्रहों से विनाशकारी अंक आतंकी हमलों के समय कहीं न कहीं और किसी न किसी रुप से अवश्य ही जुड़े हुए थे। धमाकों में अंक 1 सबसे सुरक्षित अंक रहा। जहॉ किसी आतंकी हमले में सबसे सुरक्षित अंक 1 का हाथ रहा भी था तो उस काल में उससे संबंधित ग्रह क्रूर संज्ञक नहीं थे अथवा अग्नि तत्व से भी नहीं जुड़े हुए थे।
ज्योतिष आंकलन के द्वारा यदि गंभीरता से अंकों की भाषा को पढ़ने और समझने का प्रयास किया जाए तो अनेक प्रकार की आतंकी घटनाओं का पूर्वानुमान लगाना भी संभव है, यह बात सैकड़ों उदाहराणों से रुड़की के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं ज्योतिषी गोपाल राजू ने सिद्ध कर दी है।
|
विषय के जिज्ञासु एवं बौद्धिक पाठकगण अपने-अपने बुद्धि-विवेक से मेरे इस मूल शोध कार्य को और भी आगे बढ़ाने के लिए कुछ वास्तविक रुप से घटित उदाहरणों का चिंतन-मनन करें।
मुम्बई में हुए आतंकी काण्ड (26-11-2008) में मूलांक 8 (2+6=8) यानि के दिनांक का जोड़ तथा पूर्णांक, भाग्यांक अथवा जन्मांक 2 आता है। (2+6+1+1+2+8=20=2+0=2) मूलांक 8 का कारक ग्रह शनि है जो काण्ड के समय सिंह राशि अर्थात् अग्नि तत्व में स्थित है।
ज्योतिष में मेष, सिंह तथा धनु राशि को अग्नि तत्व का प्रतीक माना जाता है। 27-7-2008 को हुए आतंकी हमले में मूलांक तथा पूर्णांक क्रमशः 9 और 8 अंक थे। उनके कारक ग्रह मंगल तथा शनि भी दुर्भाग्य से उस दिन अग्नि तत्व में स्थित थे।
वाराणसी में हुए धमाकों (23-11-2007) में मूलांक तथा पूर्णांक क्रमशः 5 और 7 थे। इनके कारक ग्रह बुध तथा शुक्र अग्नि तत्व राशि, नवांश आदि में स्थित थे।
22-5-2005 को दिल्ली में हुए धमाकों में मूलांक तथा पूर्णांक क्रमशः 4 और 7 थे। इनमें सूर्य, चंद्र, राहु तथा केतू अंकों के कारक ग्रह थे तथा सभी सिंह राशि अर्थात् अग्नि तत्व में स्थित थे।
ऐसे ही 27-2-1998 को अहमदाबाद में हुए काण्ड में मूलांक तथा पूर्णांक क्रमशः 9 और 8 थे। इनके ग्रह मंगल और शनि उस दिन अग्नि तत्व में स्थित थे। इसी प्रकार 23-11-2007 को वाराणसी में हुए धमाकों में मूलांक तथा पूर्णांक क्रमशः 5 और 7 थे। इनके कारक ग्रह बुध तथा केतू अग्नि तत्व की राशि, नवांश आदि से जुड़े हुए थे। दिल्ली में हुए धमाकों में (22-5-2005) मूलांक तथा पूर्णांक 4 और 7 थे। इनके ग्रह सूर्य, चंद्र, राहु तथा केतू सिंह राशि में स्थित थे। ठीक इसी प्रकार 27-2-1998 को मुम्बई में हुए धमाकों में मूलांक तथा पूर्णांक क्रमशः 9 और 2 थे। इनके कारक ग्रह मंगल और चंद्र किसी न किसी प्रकार से षोडश वग्र कुण्डली से जुड़े हुए थे। 31-5-2007 को हुए हैदराबाद धमाकों में मूलांक 4 और पूर्णांक 9 थे। इनके कारक ग्रह सूर्य, राहु तथा मंगल ग्रह थे। मंगल उस दिन धनु राशि के नवांश में था जो कि अग्नि तत्व दर्शता है।
मुम्बई धमाका (11-7-2006) जहॉ कारक अंक 2 और 8 थे। अमृतसर धमाका, अंक थे 5 तथा 6। मुंम्बई धमाका (9-9-2006) कारक थे 9 तथा 8। गोरखपुर धमाका (22-5-2007) कारक थे अंक 4 और 9। मालेगांव धमाका (8-9-2009) अंक बने थे 8 और 7। गुहाटी धमाके (29-9-2008) में अंक थे 3 और 3। दिल्ली धमाका (30-12-1997) अंक थे 3 और 5।
2008 तथा 2009 की अवधि में पाकिस्तान में हुए धमाकों ने तो मेरे शोध कार्य को और भी अधिक पुख्ता सबूत दे दिए। यहॉ भी मैनें पाया कि अंक 1 सर्वाधिक सुरक्षित अंक सिद्ध हुआ। यदि इस भाग्यशाली अंक की आवृत्ति हुई भी तो वह नहीं के बराबर थी। सुधी पाठक पुष्टि के लिए कुछ आतंकी धमाकों पर ध्यान दें।
दिनांक 27-3-2009 को मूलांक 9 तथा भाग्यांक 5 था।
दिनांक 21-9-2008 को मूलांक 3 तथा भाग्यांक 4 था।
दिनांक 16-3-2009 को मूलांक 7 तथा भाग्यांक 3 था।
दिनांक 22-9-2008 को मूलांक 4 तथा भाग्यांक 5 था।
दिनांक 20-2-2009 को मूलांक 2 तथा भाग्यांक 6 था।
दिनांक 12-3-2009 को मूलांक 3 तथा भाग्यांक 8 था।
दिनांक 20-9-2008 को मूलांक 2 तथा भाग्यांक 3 था।
विदेशों में हुए कुछ आतंकी हमलों की तिथियां भी ध्यान से देखें। आप पाएंगें यहॉ भी 1 सर्वाधिक सुरक्षित अंक रहा है और 2, 7 और 9 अंकों ने आतंकी हमलों का गणित बिठाया है।
7-2-2005 का लंदन धमाका, अंक थे 7 और 3।
11-12-2007 का अल्जीरिया, धमाका अंक थे 2 और 5।
11-8-2007 का रुस, धमाका अंक थे 5 और 4।
7-7-2008 का काबुल, धमाका अंक थे 7 और 6।
17-8-2005 का बांग्लादेश, धमाका अंक थे 8 और 5।
11-3-2004 का मैड्रिड, स्पेन, धमाका अंक थे 2 और 2।
11-9-2001 का अमेरिका, धमाका अंक थे 2 और 5।
15-4-2013 का बोस्टन, अमेरिका, धमाका अंक थे 6 और 7।
16-1-2006 का अफगानिस्तान, धमाका अंक थे 7 और 7।
11-4-2006 का पाकिस्तान, धमाका अंक थे 7 और 7।
24-4-2006 का इजिप्ट, धमाका अंक थे 6 और 9।
15-4-2006 का श्री लंका, धमाका अंक थे 6 और 9।
18-7-2006 का ईराक, धमाका अंक थे 9 और 6।
अभी हुए अमेरिका के सिलसिले बार 2 धमाकों ने तो मेरे शोध कार्य को और भी अधिक बल दे दिया। तारीख थी 15 अप्रेल 2013, मूलांक 6 और पूर्णांक था वही आतंकी और दुर्भाग्यपूर्ण 7। दस वर्ष बाद अपने इस शोधपूर्ण लेख को मैं दोबारा नहीं लिखता। यदि अमेरिका के बोस्टन शहर के एक दिन बाद ही बैंगलोर में 17-4-2013 को बम धमाका न हुआ होता। यहॉ भी मूलांक 8 तथा भाग्यांक 9 थे।
पाठकों ने देश-विदेश के इन उदाहरणों से देख लिया होगा कि आतंकी हमलों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण अंक 2, 7 तथा 9 किस प्रकार अपना ताण्डव दिखाया है और भाग्यशाली 1 किस प्रकार सर्वाधिक सुरक्षित अंक रहा है।
मानसश्री गोपाल राजू (वैज्ञानिक)
(राजपत्रित अधिकारी) अ.प्रा.
website : www.astrotantra4u.com
E-mail:gopalraju12@yahoo.com


